श्री गुरु तेग बहादुर खालसा महाविद्यालय, जबलपुर में दिनांक 31 जुलाई 2026 को महाविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ द्वारा गुरु पूर्णिमा महोत्सव महर्षि संदीपनि गुरुपर्व का आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आर. एस. चंडोक जी के मार्गदर्शन में गरिमामय एवं आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. मुकुंद दास जी महाराज (प्रख्यात संत एवं आध्यात्मिक चिंतक, श्री गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, जबलपुर) तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में सरदार हरजीत सिंह जी (प्रधान ग्रंथी, गोरखपुर गुरुद्वारा, जबलपुर), व एडवोकेट श्री पंकज दुबे जी (अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, जबलपुर), कार्यक्रम अध्यक्ष, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आर. एस. चंडोक जी, डॉ. मनीष शाह (विभागाध्यक्ष, वाणिज्य विभाग), डॉ. विपिन राय (विभागाध्यक्ष, प्रबंधन विभाग), डॉ. शशि दुबे (प्रभारी, भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ) एवं डॉ. आरती शुक्ला (विभागाध्यक्ष, लॉ विभाग), व डॉ. स्वर्ण तिवारी की मंच पर गरिमामयी उपस्थिती रही। सर्वप्रथम सरदार हरजीत सिंह जी ( प्रधानग्रंथी, गोरखपुर, गुरुद्वारा ) द्वारा महाविद्यालय की निरंतर प्रगति, एवं समस्त विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य तथा उनके ज्ञान, संस्कार एवं सर्वांगीण विकास हेतु विशेष अरदास की गई,एवं माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। इसके उपरांत स्वागत बेला में सभी अतिथियों का शाल एवं पौधे भेंट कर आत्मीय स्वागत किया गया।तदुपरान्त अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य महोदय ने गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु केवल ज्ञान का संचार नहीं करते, बल्कि वे जीवन को दिशा, दृष्टि और मूल्य प्रदान करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाला पथप्रदर्शक माना गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से गुरु के प्रति श्रद्धा, अनुशासन एवं निरंतर ज्ञानार्जन की भावना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का भी संवर्धन करे। मुख्य अतिथि डॉ. मुकुंद दास जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा कि गुरु वह शक्ति हैं, जो व्यक्ति के भीतर निहित संभावनाओं को जागृत कर उसे आत्मबोध एवं लोकमंगल के पथ पर अग्रसर करती है। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने जीवन में सद्गुरु के आदर्शों को अपनाते हुए सत्य, सेवा, संस्कार एवं समर्पण के मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को उत्कृष्ट बनाने की साधना है। वहीं विशिष्ट अतिथि एडवोकेट श्री पंकज दुबे जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। गुरु हमें केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि सही और गलत के मध्य विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने जीवन में नैतिक मूल्यों, संवैधानिक कर्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान अतिथियों द्वारा गुरु पूर्णिमा के महत्व, भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता तथा गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने उपस्थित विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों को प्रेरित किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. हर्षिता शुक्ला, डॉ. गुरप्रीत कालरा एवं डॉ. बलबीर कौर द्वारा अत्यंत प्रभावी एवं गरिमामय ढंग से किया गया। अंत में भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ की प्रभारी डॉ. शशि दुबे द्वारा सभी अतिथियों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम के सफल संपादन में भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के सभी सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस अवसर पर डॉ. अंजू पाठक, श्रीमती प्रकृति बिस्वास, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. विमल शुक्ला, डॉ. संध्या कोष्टा, डॉ. एल. एन. साहू, डॉ. अम्बिका तिवारी, डॉ. निरंजन पटेल अन्य समस्त प्राध्यापक एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।



